Supreme Court on Cancer Medicine Price: कैंसर की दवाओं की कीमत पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा- मरीजों के साथ दिनदहाड़े डकैती हो रही है
नई दिल्ली। कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की कीमतों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने तीखी टिप्पणी की है। अदालत ने दवा कंपनियों की मूल्य निर्धारण व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि कोई दवा रिटेलर को 2,700 रुपये में उपलब्ध होती है और उसी पर 27,000 रुपये की एमआरपी छापी जाती है, तो यह मरीजों के साथ “दिनदहाड़े डकैती” के समान है।

कैंसर की दवाओं की कीमत पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
मंगलवार को सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने जीवनरक्षक दवाओं, विशेषकर कैंसर की दवाओं की ऊंची कीमतों पर गंभीर चिंता व्यक्त की। अदालत ने पूछा कि आखिर मरीजों से इतनी अधिक कीमत क्यों वसूली जा रही है, जबकि दवा की वास्तविक खरीद लागत इससे कई गुना कम है।
कोर्ट ने कहा कि कैंसर जैसे गंभीर रोग से जूझ रहे मरीज पहले से ही आर्थिक और मानसिक दबाव में होते हैं। ऐसे में दवाओं पर अत्यधिक मुनाफा कमाना गंभीर चिंता का विषय है।
DPCO-2013 की कमियों पर सुनवाई
यह मामला ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO), 2013 से जुड़ी जनहित याचिकाओं की सुनवाई के दौरान सामने आया। याचिकाकर्ता किशन चंद जैन और संजय कुलश्रेष्ठ ने दावा किया कि मौजूदा व्यवस्था में कई जरूरी दवाओं की शुरुआती कीमत तय करने पर सरकार का प्रभावी नियंत्रण नहीं है।
याचिका में कहा गया है कि सरकार केवल शेड्यूल्ड ड्रग्स की कीमतों को नियंत्रित करती है, जबकि गैर-शेड्यूल्ड दवाओं की शुरुआती कीमत तय करने में कंपनियों को काफी स्वतंत्रता प्राप्त है।
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सरकार के नियंत्रण पर उठे सवाल
सुनवाई के दौरान किशन चंद जैन ने स्वयं अदालत में पक्ष रखते हुए कहा कि बाजार में उपलब्ध दवाओं में केवल लगभग 17 प्रतिशत दवाएं ही शेड्यूल्ड श्रेणी में आती हैं, जिनकी कीमतों पर सरकार का सीधा नियंत्रण है। बाकी अधिकांश दवाओं की शुरुआती कीमतें कंपनियां स्वयं तय करती हैं, जिससे मरीजों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है।
अस्पतालों की इन-हाउस फार्मेसी भी जांच के दायरे में
सुप्रीम कोर्ट कैंसर दवाओं की कथित मनमानी कीमतों के साथ-साथ अस्पतालों की इन-हाउस फार्मेसी से जुड़े मामलों पर भी सुनवाई कर रहा है। अदालत के समक्ष दायर दो अलग-अलग जनहित याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि कई अस्पताल मरीजों को महंगी दवाएं खरीदने के लिए अपनी फार्मेसी का ही उपयोग करने के लिए बाध्य करते हैं।
मरीजों के हित में क्या होगा अगला कदम?
सुप्रीम कोर्ट की इस सख्त टिप्पणी के बाद जीवनरक्षक दवाओं की मूल्य निर्धारण नीति और दवा कंपनियों की मूल्य प्रणाली पर नई बहस शुरू हो गई है। मामले की अगली सुनवाई में अदालत केंद्र सरकार और संबंधित पक्षों से विस्तृत जवाब मांग सकती है। इस फैसले का असर भविष्य में दवा मूल्य नियंत्रण नीति पर भी पड़ सकता है।
