Chhattisgarh High Court: सेवा भूमि पर कोटवार और उनके वारिस नहीं कर सकते मालिकाना हक का दावा
Chhattisgarh High Court: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कोटवारों की सेवा भूमि (Service Land) को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) सहित तीन न्यायाधीशों की फुल बेंच ने स्पष्ट किया है कि 1950 में जमींदारी उन्मूलन से पहले मालगुजारों या जमींदारों द्वारा सेवा के बदले कोटवारों को दी गई भूमि पर कोटवार या उनके उत्तराधिकारी भू-स्वामी (मालिकाना) अधिकार का दावा नहीं कर सकते।

यह फैसला प्रदेश में लंबे समय से चल रहे ऐसे मामलों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिनमें कोटवार परिवार सेवा भूमि पर मालिकाना हक की मांग कर रहे थे।
क्या है पूरा मामला?
मामला कबीरधाम जिले के गजेंद्र दास और जरहाटोला निवासी सुकृत दास द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए सेवा भूमि पर मालिकाना हक देने की मांग की थी।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि इस विषय पर पहले दो अलग-अलग डिवीजन बेंच द्वारा दिए गए फैसलों में विरोधाभास है। इसी कारण मामले को अंतिम निर्णय के लिए फुल बेंच के पास भेजा गया।
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फुल बेंच ने क्या कहा?
हाईकोर्ट की फुल बेंच ने अपने फैसले में कहा कि—
- जमींदारी उन्मूलन से पहले कोटवारों को दी गई सेवा भूमि केवल सेवा के उद्देश्य से प्रदान की गई थी।
- इस भूमि पर कोटवार या उनके उत्तराधिकारी भू-स्वामी अधिकार (Ownership Rights) का दावा नहीं कर सकते।
- सेवा भूमि को निजी संपत्ति या पैतृक संपत्ति नहीं माना जा सकता।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
यह निर्णय छत्तीसगढ़ के हजारों ऐसे मामलों को प्रभावित कर सकता है, जहां कोटवार सेवा भूमि पर स्वामित्व को लेकर विवाद चल रहे हैं। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, फुल बेंच का फैसला भविष्य में इस तरह के मामलों में नजीर (Precedent) का काम करेगा और निचली अदालतों के लिए भी मार्गदर्शक रहेगा।
पहले क्यों था विवाद?
इस मामले में पहले हाईकोर्ट की दो अलग-अलग डिवीजन बेंचों ने अलग-अलग व्याख्या की थी, जिससे कानूनी स्थिति स्पष्ट नहीं थी। विरोधाभासी आदेशों के कारण सिंगल बेंच ने पूरे मामले को फुल बेंच के समक्ष भेजा था। अब फुल बेंच के फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि सेवा भूमि पर कोटवार और उनके वारिस मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकते।
