Bastar Dussehra: एक साल की मेहनत, 40 गांवों का हुनर! बस्तर दशहरा के रथ की रस्सी की अनोखी कहानी
Bastar Dussehra: विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा केवल अपने विशाल रथ और अनूठी परंपराओं के लिए ही नहीं, बल्कि उससे जुड़ी सदियों पुरानी लोक परंपराओं के लिए भी जाना जाता है। इन्हीं में से एक है रथ को खींचने वाली विशाल रस्सी, जिसे तैयार करने में पूरे एक साल का समय लगता है। करीब 40 गांवों के ग्रामीण जंगलों से सिहाड़ी के पेड़ की छाल इकट्ठा करते हैं और पारंपरिक तकनीक से इस मजबूत रस्सी का निर्माण करते हैं। यह जिम्मेदारी पीढ़ियों से परजा जनजाति निभाती आ रही है।

एक साल पहले शुरू हो जाती है तैयारी
बस्तर दशहरा की शुरुआत भले ही सावन अमावस्या पर होने वाली पाट जात्रा से मानी जाती है, लेकिन रथ की रस्सी बनाने की प्रक्रिया लगभग एक वर्ष पहले शुरू हो जाती है। ग्रामीण जंगलों से सिहाड़ी की छाल लाकर उसे सुखाकर सुरक्षित रखते हैं। दशहरा नजदीक आने पर सभी गांवों के लोग करंजी में एकत्र होकर पारंपरिक तरीके से करीब 120 हाथ लंबी विशाल रस्सी तैयार करते हैं।
40 गांवों की सामूहिक मेहनत से तैयार होती है रस्सी
इस रस्सी को बनाने में करीब 40 गांवों के लोगों का सामूहिक श्रम शामिल होता है। बिना किसी आधुनिक मशीन के पूरी प्रक्रिया हाथों से की जाती है। यही वजह है कि यह रस्सी केवल एक साधारण साधन नहीं, बल्कि बस्तर की लोक संस्कृति, परंपरा और सामूहिक सहभागिता का प्रतीक मानी जाती है।
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रथ खींचने में होती है इस्तेमाल
जोगी बिठाई की रस्म के दूसरे दिन से फूल रथ का निर्माण शुरू होने के साथ ही इस रस्सी का उपयोग किया जाता है। रथ के दोनों ओर करीब 60-60 हाथ लंबी रस्सी बांधी जाती है, जिसे पकड़कर हजारों श्रद्धालु एक साथ रथ खींचते हैं और परिक्रमा पूरी करते हैं।
रस्सी के टुकड़े घर ले जाने की अनोखी मान्यता
बस्तर दशहरा से जुड़ी इस रस्सी का धार्मिक महत्व भी बेहद खास है। मान्यता है कि रथ यात्रा पूरी होने के बाद श्रद्धालु दक्षिणा अर्पित कर रस्सी का छोटा-सा हिस्सा अपने घर ले जाते हैं। लोगों का विश्वास है कि इससे घर में सुख-समृद्धि आती है, दुख-दर्द दूर होते हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
बस्तर दशहरा की यह परंपरा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आदिवासी संस्कृति, सामूहिक श्रम, प्रकृति के प्रति सम्मान और पीढ़ियों से चली आ रही विरासत का जीवंत उदाहरण है।
