Featuredहेल्थ

Cancer Detection: एक छोटे से ब्लड सैंपल से कैंसर की पहचान की नई उम्मीद, जानिए क्या है लिक्विड बायोप्सी तकनीक

Health News: बदलती जीवनशैली, बढ़ता प्रदूषण और अनियमित खानपान के कारण कैंसर के मामलों में लगातार वृद्धि देखी जा रही है। ऐसे में सबसे बड़ी चुनौती बीमारी की समय पर पहचान है। अब विज्ञान ने इस दिशा में एक नई उम्मीद जगाई है। विशेषज्ञों द्वारा विकसित की जा रही लिक्विड बायोप्सी (Liquid Biopsy) तकनीक भविष्य में कैंसर की शुरुआती पहचान को पहले से कहीं अधिक आसान बना सकती है।

Cancer Detection

इस नई तकनीक के जरिए केवल एक छोटे से ब्लड सैंपल से शरीर में मौजूद कैंसर के शुरुआती संकेतों का पता लगाने की कोशिश की जा रही है। यदि यह तकनीक व्यापक स्तर पर सफल होती है, तो लाखों मरीजों को समय रहते इलाज मिलने की संभावना बढ़ जाएगी।

क्या है लिक्विड बायोप्सी तकनीक?

कनाडा के प्रिंसेस मार्गरेट कैंसर सेंटर (टोरंटो) के वैज्ञानिक एक विशेष ब्लड टेस्ट पर काम कर रहे हैं, जिसे लिक्विड बायोप्सी कहा जाता है। यह तकनीक खून में मौजूद कैंसर कोशिकाओं से निकलने वाले डीएनए (Circulating Tumor DNA) के बेहद सूक्ष्म अंशों की पहचान करती है। कई बार ये संकेत इतने शुरुआती होते हैं कि सामान्य CT Scan या अन्य जांचों में दिखाई भी नहीं देते।

7,000 मरीजों पर होगा बड़ा अध्ययन

इस रिसर्च में करीब 7,000 ऐसे मरीजों को शामिल किया गया है, जिनका कैंसर का इलाज पहले ही पूरा हो चुका है।

शोधकर्ता कई वर्षों तक उनके ब्लड सैंपल की जांच करेंगे ताकि यह समझा जा सके कि यह टेस्ट:

  • कैंसर के दोबारा लौटने की कितनी सटीक भविष्यवाणी कर सकता है।
  • बीमारी की शुरुआती अवस्था को कितनी जल्दी पहचान सकता है।
  • इलाज की सफलता का बेहतर मूल्यांकन कर सकता है।

पॉजिटिव रिपोर्ट आने पर तुरंत शुरू हो सकता है इलाज

यदि ब्लड टेस्ट में कैंसर के डीएनए के अंश मिलते हैं, तो डॉक्टर मरीज को समय रहते:

  • इम्यूनोथेरेपी
  • टारगेटेड थेरेपी
  • अन्य आधुनिक उपचार

शुरू कर सकते हैं।

वहीं यदि रिपोर्ट पूरी तरह सामान्य आती है, तो मरीज को अनावश्यक कीमोथेरेपी या रेडिएशन से बचाया जा सकता है, जिससे दुष्प्रभाव भी कम होंगे।

कई प्रकार के कैंसर पर हो रही जांच

SHERLOCK क्लिनिकल ट्रायल के तहत वैज्ञानिक यह भी जानना चाहते हैं कि यह तकनीक सिर्फ एक नहीं बल्कि कई प्रकार के कैंसर की पहचान में कितनी प्रभावी है। रिसर्च के दौरान मरीजों की लगभग 5 वर्षों तक निगरानी की जाएगी।

विशेषज्ञों ने क्या कहा?

विशेषज्ञों का कहना है कि शुरुआती परिणाम काफी उत्साहजनक हैं, लेकिन फिलहाल इस तकनीक को नियमित चिकित्सा प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बनाया गया है।

इसे व्यापक स्तर पर लागू करने से पहले:

  • बड़े क्लिनिकल ट्रायल
  • पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण
  • दीर्घकालिक परिणाम

आना जरूरी है।

एक मरीज की कहानी बनी उम्मीद

टोरंटो के 68 वर्षीय पॉल लोनेर्गन, जिनका गले के कैंसर का इलाज पूरा हो चुका था, इस ट्रायल का हिस्सा बने। ब्लड टेस्ट में कैंसर के बचे हुए अंश मिलने के बाद उन्हें नई इम्यूनोथेरेपी दी गई। इलाज के बाद उनकी लगातार जांच सामान्य रही और अब वे सामान्य जीवन की ओर लौट चुके हैं।

भविष्य में कैसे बदलेगी कैंसर जांच?

यदि यह तकनीक पूरी तरह सफल होती है, तो भविष्य में:

  • कैंसर की शुरुआती पहचान आसान होगी।
  • बीमारी के दोबारा लौटने का पहले से पता चल सकेगा।
  • समय पर इलाज शुरू किया जा सकेगा।
  • अनावश्यक कीमोथेरेपी और रेडिएशन से बचा जा सकेगा।
  • मरीजों के जीवित रहने की संभावना बढ़ सकती है।

हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यह तकनीक अभी शोध के चरण में है और इसे नियमित जांच का हिस्सा बनने में अभी समय लग सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *