Nag Panchami 2026: नाग पंचमी पर कालसर्प दोष की शांति का विशेष उपाय, नाग-नागिन का जोड़ा सात बार उतारकर करें ये विधि
Nag Panchami 2026: नाग पंचमी का पर्व भगवान शिव और नाग देवता की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार नाग पंचमी के दिन राहु-केतु के अशुभ प्रभाव और कालसर्प दोष की शांति के लिए विशेष पूजा-विधान किए जाते हैं। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक नाग देवता और भगवान शिव की पूजा करने से जीवन की बाधाओं से मुक्ति और सुख-समृद्धि की कामना की जा सकती है। यदि कुंडली में कालसर्प दोष होने की मान्यता हो, तो नाग पंचमी के दिन चांदी या तांबे से बने नाग-नागिन के जोड़े की पूजा करने का विधान बताया जाता है।

नाग पंचमी पर कैसे करें नाग-नागिन की पूजा?
नाग पंचमी की सुबह सूर्योदय से पहले स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद पूजा स्थल की सफाई कर भगवान शिव और शिवलिंग के सामने देसी घी का दीपक जलाएं। हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर कालसर्प दोष की शांति और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए संकल्प लें।
नाग-नागिन के जोड़े को ऐसे करें पूजन
चांदी या तांबे से बने नाग-नागिन के जोड़े को पहले गंगाजल और शुद्ध जल से स्नान कराएं। इसके बाद इसे पूजा की थाली में स्थापित करें। नाग-नागिन के जोड़े पर चंदन, रोली, अक्षत, पुष्प, धूप और दीप अर्पित करें। साथ ही शिवलिंग पर जल चढ़ाते हुए “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप करें। पूजा के दौरान भगवान शिव और नाग देवता का ध्यान करते हुए राहु-केतु से जुड़े कष्टों के निवारण की प्रार्थना करें।
यह भी पढ़ें: Nag Panchami 2026 Story : नाग देवताओं की उत्पत्ति कैसे हुई? पढ़ें शेषनाग
सात बार सिर के ऊपर से उतारने की विधि
पूजन पूरा होने के बाद नाग-नागिन के जोड़े को दोनों हाथों में श्रद्धापूर्वक लें। इसके बाद इसे सिर के ऊपर से सात बार उल्टी दिशा (एंटी-क्लॉकवाइज) में घुमाने का विधान बताया गया है। हर बार जोड़े को घुमाते समय भगवान शिव और नाग देवता का ध्यान करें और जीवन की बाधाओं के दूर होने की प्रार्थना करें।
पूजा के बाद क्या करें?
धार्मिक मान्यता के अनुसार सात बार उतारने के बाद नाग-नागिन के जोड़े को किसी पवित्र नदी या बहते जल में प्रवाहित करने की बात कही जाती है। इसके बाद हाथ जोड़कर भगवान शिव का ध्यान करें और परिवार में सुख, शांति और समृद्धि की कामना करें।
एक जरूरी बात
यह उपाय धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं पर आधारित है। कालसर्प दोष की मान्यता और उसके प्रभावों को लेकर ज्योतिष परंपराओं में अलग-अलग मत हैं। किसी भी धार्मिक अनुष्ठान के लिए स्थानीय परंपरा और योग्य आचार्य की सलाह का पालन करना बेहतर माना जाता है। धातु की वस्तु को नदी या प्राकृतिक जलस्रोत में प्रवाहित करने के बजाय पर्यावरण को नुकसान न पहुंचाने वाला धार्मिक विकल्प अपनाना उचित है।
