CG News: शिक्षकों को हाईकोर्ट से बड़ा झटका, वरिष्ठता को लेकर याचिका खारिज, प्रमोशन पर सुनाया अहम फैसला
CG News: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सरकारी शिक्षकों की वरिष्ठता (Seniority) और पदोन्नति (Promotion) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी कर्मचारी का प्रारंभिक पदोन्नति आदेश अनियमितताओं के कारण निरस्त कर दिया जाता है, तो बाद में दोबारा मिली पदोन्नति के आधार पर वह पुराने आदेश की तारीख से वरिष्ठता का दावा नहीं कर सकता।

बिलासपुर हाईकोर्ट की इस टिप्पणी के साथ सूरजपुर जिले के पांच प्रधानपाठकों द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया गया।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति बिभू दत्त गुरु की एकलपीठ ने अपने फैसले में कहा कि यदि किसी कर्मचारी का प्रारंभिक प्रमोशन आदेश वैधानिक रूप से रद्द हो चुका है, तो उसके आधार पर वरिष्ठता का लाभ नहीं दिया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि बाद में जारी किए गए नए पदोन्नति आदेश की प्रभावी तिथि ही वरिष्ठता के निर्धारण का आधार होगी।
क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ता—
- शोभनाथ चौबे
- अशोक कुमार उपाध्याय
- दिनेश कुमार द्विवेदी
- संजय कुमार त्रिपाठी
- दिनेश कुमार कौशिक
सूरजपुर जिले की विभिन्न शासकीय पूर्व माध्यमिक शालाओं में प्रधानपाठक के पद पर कार्यरत हैं। इन सभी शिक्षकों को पहली बार 7 सितंबर 2012 को प्रधानपाठक पद पर पदोन्नति दी गई थी।
अनियमितताओं के आरोप के बाद रद्द हुआ प्रमोशन
बाद में विभागीय जांच में पदोन्नति प्रक्रिया में अनियमितताओं के आरोप सामने आने के बाद संबंधित पदोन्नति आदेश को निरस्त कर दिया गया। इसके खिलाफ शिक्षकों ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए विभागीय आदेश को रद्द करने की मांग की थी। हालांकि, अदालत ने विभागीय कार्रवाई को उचित माना और शिक्षकों की याचिका को खारिज कर दिया।
यह भी पढ़ें: Monsoon Child Diet: मानसून में बच्चों की डाइट का रखें खास ध्यान, ये चीजें
वरिष्ठता पर हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि—
- निरस्त हो चुके पदोन्नति आदेश के आधार पर वरिष्ठता नहीं मिल सकती।
- दोबारा मिली पदोन्नति की तिथि से ही सेवा लाभ और वरिष्ठता तय होगी।
- रद्द किए गए आदेश को आधार बनाकर कोई कर्मचारी वरिष्ठता का दावा नहीं कर सकता।
फैसले का क्या होगा असर?
हाईकोर्ट का यह फैसला सरकारी कर्मचारियों और शिक्षकों के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल माना जा रहा है। इससे भविष्य में पदोन्नति और वरिष्ठता से जुड़े मामलों में स्पष्टता आएगी और विभागीय नियमों के अनुरूप ही वरिष्ठता निर्धारित की जाएगी।
