Chhath Puja 2025: छठ पूजा में क्यों खाया जाता है लौकी-भात, जानिए इसके पीछे की वजह
Chhath Puja 2025: दीवाली के बाद शुरू होने वाला छठ पर्व सूर्य देव और छठी मइया की उपासना का महापर्व है। यह चार दिनों तक चलने वाला पर्व बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ के कई हिस्सों में श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाता है।

छठ पूजा का पहला दिन “नहाय-खाय” कहलाता है। इस दिन व्रती पवित्र स्नान करके सात्विक भोजन करते हैं — जिसमें खासतौर पर लौकी की सब्जी और चावल (लौकी-भात) बनाया जाता है। यह सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि इसके पीछे धार्मिक और वैज्ञानिक दोनों कारण हैं।
लौकी-भात खाने की परंपरा क्यों है?
शुद्धता और सात्विकता का प्रतीक
लौकी (घीया) को हिंदू धर्म में सात्विक आहार माना गया है। यह हल्की, पचने में आसान और शरीर को शुद्ध रखने वाली सब्जी है। छठ व्रत में शरीर और मन की पवित्रता सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है, इसलिए व्रती लौकी-भात खाकर व्रत की शुरुआत करते हैं।
शरीर को ठंडक और संतुलन प्रदान करता है
छठ पर्व कार्तिक महीने में आता है, जब मौसम में ठंड बढ़ने लगती है। लौकी शरीर का तापमान नियंत्रित रखती है, पाचन सुधारती है और शरीर को हाइड्रेटेड बनाए रखती है। इससे व्रती अगले दिनों के निर्जला उपवास को सहजता से निभा पाते हैं।
सादगी और पवित्रता का प्रतीक भोजन
लौकी-भात बहुत ही सरल, हल्का और सात्विक भोजन है। यह दर्शाता है कि व्रती भोग-विलास से दूर होकर संयम, सादगी और श्रद्धा के मार्ग पर चल रही हैं। यह भोजन आध्यात्मिक शुद्धता की शुरुआत मानी जाती है।
घी का प्रयोग – दिव्यता का प्रतीक
लौकी-भात को आमतौर पर शुद्ध देशी घी में बनाया जाता है। घी न सिर्फ स्वाद बढ़ाता है बल्कि इसे ऊर्जा और पवित्रता का प्रतीक माना गया है। इससे शरीर को ऊर्जा मिलती है और यह भोजन को “देव भोग्य” बना देता है।
धार्मिक मान्यता
लोक आस्था के अनुसार — “छठी मइया को सात्विकता और शुद्धता प्रिय है।” इसीलिए व्रती पहले दिन ऐसा भोजन ग्रहण करते हैं जो पूरी तरह पवित्र, हल्का और सात्विक हो। यह देवी को प्रसन्न करने और व्रत की सफल शुरुआत का प्रतीक है।
छठ पूजा में लौकी-भात का आध्यात्मिक संदेश
लौकी-भात सिर्फ भोजन नहीं बल्कि संयम, शुद्धता और भक्ति का संदेश है। यह दर्शाता है कि जब व्यक्ति अपने शरीर और मन दोनों को पवित्र रखता है, तभी वह सच्चे अर्थों में सूर्य देव और छठी मइया की आराधना कर सकता है।
