CG News: देश का दूसरा राष्ट्रपति भवन, सूरजपुर के पंडोनगर में…!
CG News: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू 20 नवंबर को अंबिकापुर पहुंचने वाली हैं। इस बीच सूरजपुर ज़िले का पंडोनगर एक बार फिर चर्चा में आ गया है—क्योंकि यहां स्थित है देश का दूसरा राष्ट्रपति भवन, जहां 1952 में भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने रात्रि विश्राम किया था।

दिल्ली के राष्ट्रपति भवन के बारे में सब जानते हैं, लेकिन सूरजपुर का यह ‘राष्ट्रपति भवन’ बेहद कम लोगों को ज्ञात है। यह भवन उसी घास की झोपड़ी के स्थान पर बना, जहां पंडो जनजाति ने राष्ट्रपति के रुकने की व्यवस्था की थी। लेकिन दुख की बात यह है कि जिन लोगों को डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने दत्तक पुत्र कहा, उन्हें आज तक जमीन का पट्टा भी नसीब नहीं हुआ।
कैसे बना सूरजपुर का राष्ट्रपति भवन
11 नवंबर 1952 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद सरगुजा राजा रामानुज शरण सिंह देव के साथ हेलीकॉप्टर से पंडो गांव से गुजर रहे थे। गांव की दयनीय स्थिति देखकर राष्ट्रपति वहीं रुकना चाहते थे। ग्रामीणों ने तेजी से घास की झोपड़ी तैयार की, जिसे बाद में पक्का बनाकर “राष्ट्रपति भवन” का नाम दिया गया। यही नहीं, डॉ. प्रसाद ने अपनी यात्रा के दौरान पंडो समुदाय को कपड़े, बैल, घर और अन्य सहायता दी। उन्होंने पंडो जनजाति को “दत्तक पुत्र” की संज्ञा भी दी थी। आज भी गांव में वह भवन मौजूद है, साथ ही वह पेड़ भी, जिसे राष्ट्रपति ने स्वयं लगाया था।
राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र बसंत की पीड़ा
उस समय राष्ट्रपति ने एक छोटे बच्चे को गोद लेकर उसका नाम ‘बसंत’ रखा था। बसंत आज भी उसी गांव में रहते हैं।
उन्होंने कहा— “डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने हमारे लिए बहुत कुछ किया, हमें बसाया… लेकिन आज तक हमें जमीन का पट्टा नहीं मिला। हमारे बच्चों को भी नौकरी नहीं मिल पा रही। अब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से उम्मीद है।”
70 साल बाद भी नहीं मिला जमीन का हक
गांव के पूर्व सरपंच अगर साय के अनुसार— डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने पंडो समुदाय को मुख्यधारा से जोड़ने की शुरुआत की थी लेकिन योजनाओं का सही क्रियान्वयन आज तक नहीं हुआ कई परिवार बस चुके हैं, लेकिन किसी के पास भी जमीन का पट्टा नहीं
70 सालों से लड़ाई जारी है
उन्होंने कहा कि पंडो जनजाति आज भी मूलभूत अधिकारों से वंचित है। राष्ट्रपति मुर्मू की यात्रा से जगी आशा
जिला पंचायत सदस्य नरेंद्र राजवाड़े के मुताबिक— राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के सरगुजा दौरे से पंडो जनजाति में उम्मीद जगी है कि शायद अब उन्हें जमीन का पट्टा, युवाओं के लिए रोजगार और सरकारी योजनाओं का प्रभावी लाभ मिल सकेगा। 1952 से आज तक पंडो समुदाय की स्थिति में कुछ सुधार जरूर हुआ है, लेकिन वह पर्याप्त नहीं है। गांव अब भी अपने हक़ के इंतजार में है।
