Navratri Special: बस्तर की मां हिंगलाजिन माता का धाम, पाकिस्तान के प्रसिद्ध हिंगलाज शक्तिपीठ से जुड़ती है आस्था
Jagdalpur: छत्तीसगढ़ का बस्तर अपनी समृद्ध संस्कृति, जनजातीय परंपराओं और देवी-देवताओं के प्रति गहरी आस्था के लिए जाना जाता है। इन्हीं धार्मिक स्थलों में एक प्रमुख नाम बकावंड विकासखंड के गिरोला गांव स्थित मां हिंगलाजिन माता मंदिर का है। जगदलपुर से लगभग 30 किलोमीटर दूर स्थित यह धाम वर्षों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। नवरात्रि के दौरान यहां बड़ी संख्या में भक्त माता के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं।

पीढ़ियों से चली आ रही है मां हिंगलाजिन की पूजा
स्थानीय लोगों के अनुसार, गिरोला में मां हिंगलाजिन की पूजा कई पीढ़ियों से होती आ रही है। बस्तर की धार्मिक परंपरा में ग्राम देवियों की आराधना का विशेष महत्व है और मां हिंगलाजिन को भी शक्ति स्वरूपा देवी के रूप में पूजा जाता है। गांव और आसपास के क्षेत्रों के लोग आज भी माता के प्रति गहरी श्रद्धा रखते हैं।
पाकिस्तान के हिंगलाज शक्तिपीठ से जुड़ती है धार्मिक मान्यता
मां हिंगलाजिन के नाम को पाकिस्तान के बलूचिस्तान स्थित प्रसिद्ध हिंगलाज माता शक्तिपीठ से जोड़ा जाता है। हिंदू धर्म में हिंगलाज शक्तिपीठ 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है और इसका विशेष धार्मिक महत्व है।
हालांकि, गिरोला स्थित मां हिंगलाजिन मंदिर का बलूचिस्तान के हिंगलाज शक्तिपीठ से प्रत्यक्ष ऐतिहासिक संबंध प्रमाणित नहीं है। यह संबंध मुख्य रूप से धार्मिक मान्यताओं और स्थानीय आस्था पर आधारित माना जाता है।
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माता सती की कथा से जुड़ी है शक्ति उपासना
हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, राजा दक्ष के यज्ञ में भगवान शिव का अपमान होने पर माता सती ने योगाग्नि में अपने प्राण त्याग दिए थे। इसके बाद भगवान शिव उनके शरीर को लेकर तांडव करने लगे। सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के कई हिस्से किए, जो अलग-अलग स्थानों पर गिरे और वे स्थान शक्तिपीठ कहलाए।
बलूचिस्तान स्थित हिंगलाज माता मंदिर इसी शक्ति परंपरा का प्रमुख केंद्र माना जाता है। वहीं बस्तर में मां हिंगलाजिन की पूजा भी शक्ति उपासना की इसी परंपरा से जुड़ी मानी जाती है।
छोटी कुटिया से भव्य मंदिर तक का सफर
स्थानीय श्रद्धालुओं के अनुसार, वर्षों पहले यहां केवल एक छोटी कुटिया और साधारण पूजा स्थल था। समय के साथ श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ी और मंदिर का विस्तार किया गया। आज यह धाम एक भव्य मंदिर के रूप में विकसित हो चुका है, जहां दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
कुछ स्थानीय लोगों का यह भी कहना है कि पहले माता का स्थान डीआरडीओ परिसर के भीतर था, बाद में श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए वर्तमान स्थान पर मंदिर का निर्माण किया गया। हालांकि, इस संबंध में उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेज सीमित हैं और इसकी स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
ओडिशा सहित कई राज्यों से पहुंचते हैं श्रद्धालु
मां हिंगलाजिन धाम में केवल बस्तर ही नहीं, बल्कि पड़ोसी राज्य ओडिशा और आसपास के अन्य क्षेत्रों से भी श्रद्धालु बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। नवरात्रि के दौरान मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना, धार्मिक आयोजन और भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिलती है। पंचमी, अष्टमी और नवमी के अवसर पर श्रद्धालुओं की संख्या और अधिक बढ़ जाती है।
बस्तर की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण केंद्र
मां हिंगलाजिन माता का मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि बस्तर की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। पीढ़ियों से चली आ रही पूजा परंपरा, स्थानीय आस्था और शक्ति उपासना की मान्यताओं ने इस धाम को विशेष पहचान दिलाई है। आज भी हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचकर माता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और अपनी मनोकामनाएं पूर्ण होने की कामना करते हैं।
