Chhattisgarh High Court: बाइक पर तीन सवारी बैठना अपने आप में लापरवाही नहीं, पीड़ित परिवार को मिलेगा 18.9 लाख रुपये मुआवजा
Chhattisgarh High Court: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सड़क दुर्घटना से जुड़े मुआवजा मामलों में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि मोटरसाइकिल पर तीन लोगों का सवार होना अपने आप में लापरवाही (Contributory Negligence) नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल (MACT) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें ट्रिपल राइडिंग के आधार पर मृतक के परिवार के मुआवजे में 50 प्रतिशत की कटौती की गई थी। हाईकोर्ट ने न केवल मुआवजा बहाल किया, बल्कि मृतक की आय का पुनर्मूल्यांकन करते हुए कुल मुआवजा बढ़ाकर 18.9 लाख रुपये कर दिया।

क्या था पूरा मामला?
मामला सड़क दुर्घटना में जान गंवाने वाले शिव कुमार से जुड़ा है। दुर्घटना के बाद मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल ने यह मानते हुए कि बाइक पर तीन लोग सवार थे, इसे पीड़ित की भी लापरवाही माना और परिवार को मिलने वाले मुआवजे में 50% कटौती कर दी। इस आदेश को मृतक की पत्नी, नाबालिग बेटी और अन्य आश्रितों ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस संजय के. अग्रवाल की एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि—
सिर्फ ट्रिपल राइडिंग होना यह साबित नहीं करता कि दुर्घटना उसी वजह से हुई या मृतक की लापरवाही थी।
अदालत ने कहा कि जब तक यह साबित न हो कि तीन सवारी होने के कारण ही दुर्घटना हुई, तब तक मुआवजे में कटौती करना कानूनन उचित नहीं है।
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सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के ‘मोहम्मद सिद्दीकी बनाम नेशनल इंश्योरेंस कंपनी’ मामले का उल्लेख किया।
सर्वोच्च अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि—
- ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन अपने आप में मुआवजा घटाने का आधार नहीं बन सकता।
- बीमा कंपनी को यह साबित करना होगा कि नियम उल्लंघन और दुर्घटना के बीच सीधा संबंध था।
मुआवजे में हुआ बड़ा इजाफा
हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल द्वारा तय की गई मृतक की मासिक आय में भी संशोधन किया।
कोर्ट के प्रमुख आदेश
- मासिक आय ₹6,000 से बढ़ाकर ₹7,930 निर्धारित की।
- परिवार के लिए कंसोर्टियम राशि बढ़ाकर ₹1.60 लाख की।
- कुल मुआवजा ₹6.8 लाख से बढ़ाकर ₹18.9 लाख किया।
- बीमा कंपनी को ₹12.1 लाख अतिरिक्त राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया।
- अतिरिक्त राशि पर दावा याचिका दायर होने की तारीख से 7.5% वार्षिक ब्याज भी देना होगा।
बीमा कंपनियों के लिए अहम संदेश
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि बीमा कंपनियां केवल तकनीकी आधारों, जैसे ट्रिपल राइडिंग, का हवाला देकर मुआवजे में कटौती नहीं कर सकतीं। यदि दुर्घटना और कथित नियम उल्लंघन के बीच प्रत्यक्ष संबंध साबित नहीं होता है, तो पीड़ित परिवार को पूरा मुआवजा मिलना चाहिए।
फैसले का क्या होगा असर?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला भविष्य में सड़क दुर्घटना मुआवजा मामलों के लिए महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है। इससे उन पीड़ित परिवारों को राहत मिलेगी जिनके दावों में केवल ट्रैफिक नियम उल्लंघन का हवाला देकर मुआवजा कम किया जाता रहा है।
